वास्तव !

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शनिवार, ७ मे, २०१६

.......शंकाग्रस्त बीज !........

जीवनदायी  रक्षणकर्त्यांचा  जर  घातच    प्रघात  ईथला |

ईतरांसाठी  विशाल  होऊ  का  मी  कवटाळून  मृत्युला ? || धृ.||

क्षितीजाचेहि  नसते  बंधन  शापित  भूमी  अथांग  ऐशी  |

रक्त  जळून  छायेवीण  जिकडे  सांगाड्यांच्या  अगणित  राशी  |

अनंत  वर्षे  शाप  भोगुनी  फुटे  पालवी  मग  धरणीला  | ईतरांसाठी ...|| 1 ||

करूणामयी  मग  रोप  ऊगवते  हिमालयाचे  धैर्य  अंतरी  |

वार  झेलुनी  ते  सृष्टीचे  रोप  पसरते  परोपकारी  |

श्वास  पाहूनी  तडफडणारे  रोप  घडविते  वटवृक्षाला | ईतरांसाठी ...|| 2 ||

छाया  ह्याची  बनते  घरकुल  जणू  श्वास  हा  प्रत्येकाचा  |

मरूभुमीतील  तृष्णेसाठी  जणू  निर्झर   हा  चैतन्याचा  |

कल्पवृक्ष  हा  आनंदाचा का   खुपतो  मग  त्या  दैवाला ?  ईतरांसाठी ...|| 3 ||

झंझावाती  येऊन  तांडव  प्रलयमेघ  त्या  नभास  गिळूनी  |

थरथरती  मग  दहा  दिशा हि  ईथे  दामिनींच्या  नृत्यानी  |

ढाल  बनवूनी  तरू  स्वत:सी  धरतो  हृद्यी  प्रत्येकाला  | ईतरांसाठी ...|| 4 ||

निर्भय  ऊंच  तरू  हा  पाहून  अहं  ठेंगणा  नभी  विजेचा  |

नखशिखान्त  पेटूनी  दामिनी  प्राण  जाळूनी  जाते  ह्याचा  |

बीज हि  जळते  जमिनीमध्ये  प्रश्न  विचारून  हाच  स्वत:ला  |

ईतरांसाठी  विशाल  होऊ  का  मी  कवटाळून  मृत्युला ? || 5 ||

- मकरंद सुधाकर पाटोळे कदम.

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